यक्ष रक्षित गिरारगिरि क्षेत्र
१८ वी सदी और उसके पूरी गिरार एक सुसम्पन्न एवं विकसित नगर था | यहाँ १०० जैन परिवारों के साथ लगभग १००० से अधिक परिवार निवासरत थे के भवन विहार थाना एवं अन्य अवशेष आज भी यहाँ उपलब्ध है | यह नगर प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण है | विध्यांचल की पर्वत श्रेणियाँ एवं घसान नदी आज भी उस शोभा को बरकरार किये हुए है | इसी कारण इस क्षेत्र को गिरारगिरि कहा जाने लगा | वर्तमान मै गिरार १ किलो मीटर की दूरी पर स्थित है जहाँ स्कूल , थाना , चिकित्सालय आदि शासकीय सुविधाएं उपलब्ध है |
विक्रम सम्वत १८४४ वैशाख मास तदनुसार ईसवी १७८७ माह मई में यहाँ निवासरत दिगम्बर जैन गोलपुरव मरैया वंशीय सिंघई घुर मंगल जी और उनके परिवार ने विशाल गगनचुम्बी जिनालय का निर्माण कराकर मूलनायक आदिनाथ सहित कई जिनबिंबो की प्रतिष्ठा गजरथ महोत्सव पूर्वक सम्पन्न कराई थी फलस्वरूप उन्हें सवाई सिंघई की पदवी से विभूषित किया गया |
कल परिवर्तन के साथ इस नगर का भी कुछ ऐसा समय आया कि लगभग प्रतिष्ठा के ३०-३५ वर्षो बाद में डकेतो के आतंक से यहाँ के जैन परिवार पलायन करके बरायठा , अदावन , गिदवाहा , भीकमपुर , ककरवाहा , कारिटोरन , मालगुवा , गौना , रमगढ़ा , शिवपुरी आदि स्थानों जा बसे इन्ही परिवारों के जैनी जन अब मड़ावरा , सागर , साढ़ूमल , छिंदवाड़ा , नागपुर, जबलपुर , पाटन , ललितपुर , देवास , इंदौर, उज्जैन , शाहगढ़ आदि देश के बड़े - बड़े नगरों में रह रहे है | जैन परिवारों के अतिरिक्त अन्य परिवारों में से भी कई परिवार इन्ही आसपास के स्थानों में जा बसे कुछ परिवार यहाँ से १ किलोमीटर दूर गिरार में ही रह रहे है | जिससे मूल गिरार नगर वीरान हो गया | जिनालय में विराजित आदिनाथ भगवान की प्रतिमा को उठाने का श्रावकजनो ने कई प्रयास किया किन्तु मंदिर जी केरक्षक यक्ष व्दारा उठाने नहीं दिया गया | तब चोरो ने भी अनेक बार चोटी के प्रयास किये गये पर यक्ष रक्षित मंदिर में ने असफल रहे | ऐसे अन्य कई अतिशय यहाँ सदैव होते रहते है | तब से अब तक यह जिनालय यथास्थित है |
सिंघई धुरमंगल जी इस रियासत के प्रतिष्ठान व्यवसायी थे जिनकी प्रतिष्ठा से प्रभावित होकर चारो और के किसान एवं व्यवसायी अपनी वस्तुओं को उचित मूल्य हेतु बिना किसी शर्त के छोड़ जाते थे उचित मूल्य होने पर सिंघई जी वस्तु का विक्रय कर सम्बन्थित को भुगतान करते थे | जनश्रुति अनुसार नमक व्यवसाय में हुए मुनाफे से इस जिनालय का भव्य निर्माण सिंघई परिवार व्दारा होना बताया जाता है | गिरारगिरि देश के ह्दय स्थल म. प्र. एवं उ. प्र. की सीमाओं पर स्थित है | जो बुंदेलखंड का प्राण है | इस क्षेत्र की महिमा को पूज्य गणेश प्रसाद जी वर्णी महाराज ने मेरी जीवन गाथा भाग -१ पृष्ठ १३२ पर निम्न शब्दों में रेखांकित किया है |
हम दोनों (वर्णी जी एवं सेठ कमलापत जी) प्रातःकाल (बरायठा से) गिरार मंदिर के दर्शनार्थ गए | यह स्थान बरायठा से तीन मील की दूरी पर है , मंदिर के नीचे ही अथाह जल से भरी नदी बहती है | और सब तरह अटवी है | अत्यंत रमणीय भूमि है | यह तप करने के योग्य स्थान है |
पूज्य वर्णी जी के साथ साथ वर्तमान में इस युग के महान जैनाचार्य संत शिरोमणि १०८ आचार्य विद्यासागर जी महाराज , गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज , प्रज्ञाश्रमण आचार्य श्री देवनन्दी जी महाराज , आचार्य श्री विवेक सागर जी महाराज, चर्या शिरोमणि आचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज , आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी , आचार्य विभव सागर जी महाराज आदि अनेक आचार्य एवं साधु संतो का यहाँ आगमन हुआ एवं उनके सानिध्य में अनेक धार्मिक आयोजन सम्पन्न होने से यह क्षेत्र महान आतिशय को प्राप्त है | ऐसे क्षेत्र पर आकर सभी श्रावक जन नित्य प्रति धर्म लाभ ले रहे है |
मै भी सन १९७० से इस क्षेत्र से प्रभावित होकर आजतक अनेक उपलब्धियों को हासिल कर चुका हूँ |
