१८ वी सदी एवं उसके पूर्व गिरार बुन्देलखंड की झाँसी रियासत का एक सुसम्पन्न नगर था| तत्कालीन सिंह द्वार, थाना बिहार (चोपड़ा कुआ ) शिव मंदिर , जैन मंदिर एवं मठ (स्मारक) आदि अनेक पुरावशेष आज भी यहां विदधमान है| भवनों के भग्नावशेष भी यहां यत्र -तत्र देखने को मिलते है| वर्तमान में यह नगर स्थानांतरित होकर अपने मूल स्थान से १ किमी. दूर मंडावरा मार्ग पर उ.प्र. के ललितपुर मुख्यालय से ७८ किमी. एवं म. प्र. के सागर मुख्यालय की सीमा को छूता हुआ बरायठा से ३ किमी. की दुरी पर स्थित है | यहां वर्तमान में थाना, स्कुल , पोस्ट , ऑफिस, प्राथमिक उपचार केंद्र एवं सहकारी बैंक आदि शासकीय सुविधाए उपलब्ध है | किन्तु मुलनगर गिरार दिगम्बर जैन संस्कृति के प्रतिक भव्य गगनचुम्बी आदिनाथ जिनालय के नाम से ही याद किया जा रहा है | इसके चारो ओर फेली विद्द्यागिरि की पर्वतमालाये गिरि विशेषण से सम्मानित करती है| जिनालय का चरण स्पर्श कर प्रवाहित हुई दसार्ण (धसान) नदी अपने जल को पवित्र कर जन- जन तक पवन वीतरागी सन्देश प्रसारित कर रही है|
वि. सं. १८४४ में पुण्यशाली मरैयावंशी सिंघई धुरमंगल जी तस्य पुत्र लाला हरगोविन्ददास जी ने नमक व्यापार में अकस्मात अनसोचो मुनाफे से प्रभावित होकर यहां पर गजरथ महोत्सव आयोजित करके श्री जिनबिम्ब प्रतिष्ठा एवं जिनालय का निर्माण कराया था | तब तक गिरार पूर्ण विकसित नगर था | काल ने करवट लेकर इस नगर की काया पलटकर इसे वीरान कर दिया | नगर की जगह यह गिरार गिरि में परिवर्तित हो गया | यहां के निवासी यत्र- तत्र चल बसे, साथ ही मूलनायक भगवान ऋषभदेव को भी अन्यत्र ले जाने का निर्णय कर बैठे, किन्तु ऐसा करने वालो को दुःस्वप्नो के माध्यम से सचेत किया गया कि श्री जी को स्थानांतरित न किया जाये | तदनुसार आदिदेव को यथास्थान छोड़ नागरिकगण अन्यत्र स्थानों पर निवास करने लगे | तब से अब तक के हुए काल परिवर्तन के उतार- चढ़ाव का इस जिनालय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा | यह एक महान अतिशय था |
क्षेत्रराज पर अतिशयकारी आदि बाबा के अनेक चमत्कार हुए है | जिसका उल्लेख यहां पर करना संभव नहीं है | इस निर्जन वन क्षेत्रराज पर भरत के इतिहास में पहलीबार १९९१ एवं १९९८ में ३५ दिवसीय एवं ५८ दिवसीय अखंड णमोकार मंत्र का पाठ निर्विघ्न संपन्न हुआ | प्रारम्भ में यहां पर केवल एक ही वेदी थी लेकिन वर्तमान में पांच वेदिया समवशरण के साथ क्षेत्रराज को सुशोभित कर रही है | १९९५ में आचार्य विशुध्दसागर जी एवं विवेक सागर जी के सानिध्य में एवं २००८ में आचार्य विभवसागर जी के सानिध्य में विशाल पाचकल्याणक एवं विश्व शांति महायज्ञ का आयोजन किया गया |
कबुंदेलखंड में जन्म लेकर पुरे देश में अपनी वात्सल्यता के धनी पूज्यनीय श्री १०८ आचार्य देवनन्दी जी महाराज अपनी जन्मभूमि में हो रहे पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव शाहगढ़ नगर पधारे तभी उनका मंगल सानिध्य गिरार जी क्षेत्र को अल्प प्रवास के समय हुआ | जिसमे मुख्य मंदिर का मुख्य द्वार एवं आचार्य देवनन्दी विश्रांति गृह का कार्य पूर्ण हुआ | आपने अपने प्रवास काल में बताया कि आने वाले समय में गिरार गिरि भारत के जैन तीर्थ क्षेत्रों पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ेगा | गिरार गिरि क्षेत्र जंगल में मंगल की कहावत को चरितार्थ का रहा है | यहां प्रतिवर्ष माघ कृष्ण चतुर्दशी को वार्षिक मेला एवं आदिनाथ निर्वाण महोत्सव का आयोजन होता है एवं चैत वदी नोमी को आदिनाथ जन्मोत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है | इस क्षेत्र पर आचार्य विद्यासागर जी का दो बार आगमन हुआ एवं आचार्य देवनन्दी जी, गणाचार्य विरागसागर जी, आचार्य विवेकसागर जी , आचार्य विशुद्धसागर जी , आचार्य विभव सागर जी, आचार्य विनिश्चय सागर जी , आचार्य विमद सागर जी, आचार्य विमर्श सागर जी आदि मुनिराज सासंघ पधार चुके है | क्षेत्र उ.प्र. एवं म. प्र. की सीमा प्र स्थित है | क्षेत्र के विकास के लिए कृपया उदार मन से इस अपना सहयोग प्रदान कर पुण्य लाभ अर्जित करे|
नासाग्र दृष्टि होने का अर्थ हैं जिन्होंने अंतरात्मा का दर्शन कर स्वरूप में लीन हो, "परमात्मा" का पावन पद प्राप्त कर लिया हैं |
क्योंकी बहिरात्मा जीव के काम- क्रोध- मद- लोभ की जागृति होने पर उसकी आँखों- पलकों-भौहों में विकार अवश्य आता हैं |
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