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15 NOV
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तीर्थ गिरारगिरी अतिशय क्षेत्र

दिगम्बर जैन तीर्थो में श्री गिरारगिरि अतिशय क्षेत्र विक्रम संवत १८४४ तदनुसार ई सन १७८७ माह मई में निर्मापित होकर निरंतर श्रद्धालुओ की अटूट श्रद्धा का केंद्र है| भारत के धर्म स्थल उ.प्र. एवं म. प्र. की सीमांत क्षेत्र पर स्थित यह तीर्थ विद्यागिरि की विशाल पर्वत में के बीच दसाण (घसान) नदी तट पर अवस्थित है| मूलनायक आदिनाथ स्वामी की अतिशयकारी प्रतिमा के दर्शन पूजनकर प्रत्येक भक्त गण अपने को अभिभूत मानते है| मरैया वंशीय स. सि. घुरमंगलजी ने अपनी न्यायो पार्जित लक्ष्मी का सदुपयोग इस भव्य जिनालय एवं जिनबिम्ब प्रतिष्ठा में कर स्वयं तो पुण्यार्जन किया ही देश दुनिया के भव्यो को भी पुण्यार्जन का सौभाग्य दिया जो युगो - युगो तक मिलता ही रहेगा |


परिवर्तन प्रकृति का नियम है सन १७८७ में गिरार एक विशाल नगर था | जैन परिवारों के साथ ५०० अन्य सम्प्रदाय के लोग निवासरत थे परन्तु समय के साथ साथ यहां की आबादी नगण्य रह गई मंदिर जी फिर भी यथास्थिति बना रहा नगर के वीरान होने पर क्षेत्र भय का पर्याय बनने लगा श्रवकों ने प्रतिमा जी को अन्य नगर ले जाने का दुस्साहस किया पर यसरसित होने से उन्हें कोई हिला नहीं सका विवश हो सभी ने क्षमायाचना कर प्रतिदिन पूजन हेतु आने का व्रत ले लिया | जो अब तक जैन धर्म की पताका फहराता हुआ दिंग दिगस्त में अमन चैन स्थापित किये हुये है|


इस पुनीत तीर्थ करे महान शिक्षानीद पूज्य क्षु. गणेश प्रसादजी वर्णो महाराज ने मेरी जीवन गाथा के पृष्ठ पर तप के योग्य स्थान कहा है | वर्तमान में संत शिरोमणि १०८ आचार्य विद्यासागर जी महाराज , गणाचार्य १०८ विरागसागर जी महाराज , प्रज्ञाश्रमण १०८ आचार्य श्री देवनन्दी जी महाराज १०८ आचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज , १०८ आचार्य श्री विवेकसागर जी महाराज, १०८ आचार्य श्री विभव सागर जी महाराज आदि अनेक साधुओ का आगमन इस घर पर हो चूका है |


यह तीर्थ पहाड़ियों के बीच एवं नदी किनारे होने से एकदम शांत वातावरण होने से तपोभूमि है |

द्रव्य चढ़ाना हमारे परिणामो को विशुद्ध बनाने में निमित्त हैं तथा जितने द्रव्य को हम प्रभो चरणो में अर्पण करते हैं,
उतना हमारा 'लोभ' का त्याग होता हैं |